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सुधार के राह में एक कोशिश

Posted On 8 Feb, 2017 में

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दिनांक- 6 फरवरी 2017
शयद हम आप में से किसी ने भी, यह नहीं सोचा होगा कि वर्तमान सरकार द्वारा आम बजट देश में बड़े राजनीतिक सुधार लाने की दिशा में एक भूमि तैयार करेगा। इस बजट ने देश की भावी आर्थिक उन्नती की एक झलक दिखई देती है। साथ ही साथ यह आश्वासन दिया गया है कि वर्तमान समय में राजनीतिक सुधारों का सिलसिला भी शुरू होने वाला है। वित्तमंत्री अरुण जेटली द्वारा आम बजट में यह एलान किया गया है कि अब राजनीतिक दल दो हजार रुपये से अधिक की धन राशि अज्ञात स्रोतों से प्राप्त नहीं कर पाएंगे। इससे पहले यह सीमा बीस हजार रुपये की थी। सही मायने में वास्तव मे केन्द्र सरकार ने एक क्रांतिकारी कदम उठाया है। प्रधानमंत्री ने राजनीतिक सुधारों पर जोर देते हुए पिछले दिनों कई बार इस बात को कहा कि हम राजनीतिक दलों को मिलने विभिन्न स्रोतो मिलने वाले चंदो को पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है। सुधार की इस तरह की पहल पर आने वाले कल को विभिन्न राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं देखने योग्य होगी। अधिक्तर राजनीतिक दलें खुद को मिलने वाले चंदों को पारदर्शी बनाने जैसी प्रत्येक पहल का अवश्य विरोध जरूर करेगें, लेकिन आज वर्तमान समय की ऐसी मांग है कि सभी राजनीतिक दलें अपने—अपने तौर—तरीकों में सुधार लाए।
इस चुनाव के प्रति लोगों के मन में तरह—तरह की आशंकाओं के चलते सरकार पर ऐसे आरोप भी लगाये जाने लगे कि इस बजट में अनेको प्रकार के लोकलुभावने कदमों के उठाए जाने के संकते भी मिलते रहने के कारण इसका स्वरूप बहुत पक्षपाती होना भी लग रहा था। शायद इसी आशंका के कारण विपक्षी दलों के लोग मौजूदा समय में पेश होने वाले बजट की तारीख को और आगे बढ़वाना चाहते थे। लेकिन सरकार ने 1 फरवरी 2017 वसंत पंचमी के दिन बजट को पेश कर सबको आश्चर्य में डाल दिया। समाज में जाने माने लोगों के अलावा अन्य दलों द्वारा जैसा माना जा रहा था ठिक उसके विपरीत मौजूदा वजट लोक लुभावन वादों से पूरी तरह मुक्त होने के साथ ही साथ बहुत दूरगामी असर डालने वाला नजर आरहा है। मौजूदा सरकार द्वारा पेश किया गए बजट ने यह साबीत कर दिया कि विपक्षी दलों द्वारा व्यक्त किया जाने वाला आशंकाओं से मुक्त निर्मूल साबित करने वाला है। यदि हम मौजूदा समय में पेश हुए बजट को भविष्य का बजट कहे तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी, साथ ही साथ यह बजट भारत की आर्थिक वृद्धि चक्र को बहुत प्रभावित करेगा। यदि बजट पर गौर किया जाये तो हमें यह देखने को मिलेगा कि वह चुनाव आयोग के इस सुझाव के अनुरूप व्यवस्था को लने के लिए तैयार है कि अज्ञात स्रोतों से चंदा लेने की अधिकतम धन राशि की सीमा को घटाकर 2000/- रुपये कर दिया जाए। हालांकि इस सीमा से बचने के लिए देर—सबेर सियासी दलें कोई न कोई तरकी अवश्य निकाल लेगें, लेकिन इसके प्रारम्भ करने के दृष्टिकोण से इसे ठीक ही कहा जायेगा। ऐसी शुरुआत की आवश्यक्ता इसलिए और भी अधिक हो गया था, क्योंकि एडीआर (एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स) एवं नेशनल इलेक्शन वॉच ने सन् 2004-05 से लेकर सन् 2014-15 के मध्य भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे के स्रोतों का जो विस्तृत विश्लेषण में तमामों ऐसे सबूत पेश किये जिसमें से कुछ चौंकाने वाले तथ्य निकल कर सामने आये। इस विश्लेषण के अनुसार वर्ष 2004-05 से लेकर वर्ष 2014-15 के मध्य देश के क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों की कुल आमदनी 11. 367 करोड़ रुपये थी इसमें से 7.833 करोड़ रुपये की भारी भरकम की राशि उन्हें ट्टअज्ञात स्रोतों’ से हासिल किया। यदि हम राष्ट्रीय दलों की बात करें तो वर्ष 2004 से लेकर 2014 के मध्य सत्तारूढ़ गठंधन की राष्ट्रीय कांग्रेस की सरकार को इस दौरान अज्ञात स्रोतों से मिलने वली धनराशी रुपये 3.323 करोड़ मिले जो उसकी कुल आमदनी के 83 प्रतिशत होता है।
यह विश्लेषण तमाम ऐसे साक्ष्य पेश करता है जिसके आधार पर राजनीतिक दलों के चंदे में पारदर्शिता लाने के लिए सख्त कानून नाने की जरूरत महसूस होती है ताकि वे टैक्स अथारिटी और चुनाव आयोग के प्रति अधिक जवादेह न सकें। एडीआर के विश्लेषण से कुछ चौंकाने वाले निष्कर्ष निकलते हैं। 2004-05 से 2014-15 के दौरान देश के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों की कुल आमदनी 11.367 करोड़ रुपये रही, लेकिन इसमें से 7.833 करोड़ रुपये की भारी भरकम राशि उन्हें ट्टअज्ञात स्रोतों’ से हासिल हुई। राष्ट्रीय दलों की ात करें तो 2004 से 2014 के बीच सत्तारूढ़ गठंधन की कमान संभालने वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को इस दौरान अज्ञात स्रोतों से 3.323 करोड़ रुपये मिले, जो उसकी कुल आमदनी के 83 प्रतिशत होता है।
दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी को इस अवधि में अज्ञात स्रोतों से 2.126 करोड़ रुपये मिले, जिससे उसकी कुल आय में अज्ञात स्रोतों से मिलने वाली रकम की हिस्सेदारी 65 प्रतिशत रही। यहां तक कि माकपा और आम आदमी पार्टी की भी आधे से अधिक कमाई अज्ञात स्रोतों के जरिये चंदे से ही आई। क्षेत्रीय दलों पर गौर करें तो आमदनी के लिहाज से उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के लिए यह दौर खासा खुशगवार रहा कि उसे 766 करोड़ रुपये की आय हुई लेकिन एक चिंताजनक पहलू यह है कि इस रकम का 94% हिस्सा अज्ञात स्रोतों से आया।
एडीआर का विश्लेषण तमाम अन्य चिंतित करने वाले तथ्यों की ओर संकेत करता है। मसलन इस अवधि में अज्ञात स्रोतों के जरिये राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की आमदनी में 313 प्रतिशत का इजाफा हुआ हुआ और यह 2004 में 274 करोड़ रुपये से 2014 में ढ़कर 1.131 करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गई। इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य हुजन समाज पार्टी से जुड़ा है। नोटंदी को लेकर तमाम शोरगुल करने वाली सपा इकलौती ऐसी पार्टी रही जिसने घोषित किया कि उसे 20.000 रुपये से अधिक का कोई चंदा ही नहीं मिला। इसका अर्थ यही है कि पार्टी को शत प्रतिशत चंदा ट्टअज्ञात स्रोतों’ के माध्याम से प्राप्त हुआ, जबकि पार्टी की आमदनी 2004 में 5 करोड़ रुपये से बढ़कर 112 करोड़ रुपये हो गई। इस लिहाज से पार्टी की कुल आमदनी में 2057 प्रतिशत की अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी हुई और इसमें पूरा योगदान अज्ञात रूप से चंदा देने वालों का रहा। यह भयावह निष्कर्ष है। इसके बाद कोई और सबूत देने की जरूरत नहीं रह जाती कि राजनीतिक चंदा देश में भ्रष्टाचार और काले धन के सृजन का भी उद्गम है और अब यह विकराल समस्या, नियंत्रण से बाहर होती जा रही है।
अब वर्तमान समय में यह देखना है कि यह सोच किस तरह का आकार धारण करती है। इस विषय में वर्तमान में कुछ कह पाना बहुत ही कठीन होगा। वित्तमंत्री ने अपने बजट में ऐसी कोई भी झलक नहीं दिखायी है कि जिससे यह लगे की वे एक लोक—लुभावन बजट पेश करना चाहते हैं। इसके स्थान पर उन्होंने सुधारों को ही प्राथमिकता दी और इस बात को पुख्ता करने की कोशिश अवश्य कि गई है कि देश को एक सही आर्थिक दिशा में ले जाने का उनका उद्देश्य स्पष्ट तौर पर झलकता है। वर्तमान समय मे नोटबंदी के आदेश गत वर्ष नवंबर में मोदी सरकार के विमुद्रीकरण के फैसले को देखते हुए यह बजट भारतीय अर्थव्यवस्था के ऐतिहासिक पलों में पेश किया गया है। एक तरफ जहां विश्व में विभिन्न सरकारें संरक्षणवाद का रास्ता अपना रही हैं ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अपने विकास की वृद्धि को आगे ले जाने के लिए प्रयासरत रहें। यदि हम इस संदर्भ में कहें तो इस बजट में लीक से हटकर कई फैसले लिए गये हैं। इसके उदाहरणस्वरूप वित्तमंत्री अरुण जेटली ने राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से टैक्स के आधार में विस्तार करने और डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए ढांचा खड़ा करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
बजट के संदर्भ में अब बहुत से लोगों एवं अर्थशास्त्रीयों द्वारा तरह—तरह की समीक्षाएं हमारे सामने आएगीं, लेकिन यदि हम कहें तो कुल मिलाकर वर्तमान समय का बजट परिवर्तन लाने का मार्ग प्रशस्त करती है। इस तरह के निष्कर्ष निकालने के कुछ कारण भी मौजूद हैं। जिसमे से एक कारण तो राजनीतिक फंडिंग जैसी व्यवस्थााओं में सुधार से स्पष्ट है गांवों में कृषि और उनसे जुड़े क्षेत्रों के बजट आवंटन में लगभग पच्चीस प्रतिश्त तक की वृद्धि कि गई है। सरकार के मौजूद बजट से अपना इरादा स्पष्ट करना चाहती है कि वह नोटबंदी के फलस्वरूप भारत की विकास दर में कमी आने जैसी बातों पर उन आशंकाओं को समाप्त करना चाहती है कि नोटबंदी का तात्कालिक असर तो है, लेकिन अगर सरकार बुनियादी ढांचे में खर्च बढ़ाती है तो इससे न केवल रोजगार के अवसरों में वृद्धि होने के साथ ही साथ विकास की गती में भी तेजी आयेगी। अब यहाँ यह प्रश्न उठता है कि केन्द्र इसमें निजी क्षेत्रों से कितनी मदद लेने में कामीयाब होती है। मौजूदा सरकार निजी क्षेत्रों के निजी निवेशकों को उत्साहित बेशक करना चाहती है। लेकिन उसने यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि जो लोग आर्थिक घपलेबाजी कर अक्सर इधर-उधर हो जाते हैं ऐसे लोग किसी भी सूरत मे बच न पाएं। जिसके लिए वित्तमंत्री ने ऐसे लोगों की संपत्तियों को जब्त करने जैसे कानून लाने का वादा किया है। इससे भ्रष्ट्राचार और भ्रष्ट्राचारियों के विरूद्ध सख्त संदेश ही जाता है। बजट में मोदी सरकार की एक और बड़ी पहल कम लागत वाली आवासीय परियोजनाओं को बुनियादी क्षेत्र में शामिल करना है। प्रत्येक बार की तरह इस बार भी आम बजट में काफी कुछ एक जैसा है। कहने का अर्थ यह है कि शिक्षा, स्वास्थ्य आदि विषयों पर किये जाने वाले खर्चो में थोड़ा-बहुत हेर-फेर करके बनाया गया है निःसंदेह सरकार ने देश की आर्थिक दिशा को और अधिक स्पष्ट करने के लिए आम बजट के रूप में मिले एक अवसर का भरपूर लाभ मिलेगा।

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